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ऐसी ये कैसी तमन्ना है........3

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18 वर्ष की युवावस्था में गुरुदास अपने मित्र अनंतराम के साथ मुंबई पहुँचता है…….बहुत से अरमान साथ होते हैं अपने घर में आर्थिक आभाव को पूर्ण करने का दायित्व साथ होता है………
कहानी अब आगे………

ऐसी ये कैसी तमन्ना है……..3

चाय चाय गरम चाय……..गुरुदास नींद से जागता है……ट्रेन मुंबई पहुँचने वाली है……..मुस्कुराते हुए…… चाय वाले से गुरुदास एक कप चाय पीता है…अनंतराम अब भी सोया हुआ है…..अनंतराम के अपने सपने हैं और मुंबई आने की खुशी में वो उन्ही सपनों में खोया हुआ है…….सपनों में अनंतराम भारत का नया प्रधानमंत्री है 15 अगस्त का अवसर है मनमोहन सोनिया प्रणब चिदंबरम आडवाणी लालू……etc ….सब के सब घोटालेबाज अनंतराम के आर्मी की गिरफ्त में हैं प्रधानमंत्री अनंतराम लाल किले में एक अजीब सी उदघोसना करते है…….
सभी भ्रष्ट नेताओं को लाल किले में उल्टा टांग दिया जाता है……..

गुरुदास की गरम चाय अनंतराम के हाथ में गिर जाती है….अनंतराम अजीब सी मुस्कान लिए नींद से जागता है…..ट्रेन स्टेशन में धीरे धीरे रुक जाती है……!

अनंतराम के मोबाइल पर उसके चाचा किसनलाल का फ़ोन आता है……दोनों को अपने घर लेने वो स्टेशन पहुँचते हैं….
किसनलाल 35 वर्षीय ब्रह्मचारी हैं अब तक उनका विवाह किसी से नहीं हुआ है……. वे जुपिटर नामक शरकश में काम करते हैं….. उनके शरकश और उनका ठिकाना बदलता रहता है………

गुरुदास और अनंतराम रोजगार के लिए यहाँ वहां भटकते हैं……पर मायानगरी की माया में उनको अपने ढंग का रोजगार नहीं मिल पाता है
अच्छी नौकरियों के लिए डिग्रियों की डिमांड है…….और लेवर या क्रिमिनल्स जॉब के लिए किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं
गुरुदास और अनंतराम के पास न डिग्रियां थी और न गलत काम करने का उद्देश्य…….ऐसे में वो करते भी तो क्या..?

माँ पिताजी का फ़ोन भी आया करता…….कुशल मंगल पूछ कर सफल होने का आशीर्वाद देते……

फुर्सत में चाचा किशनलाल अपने शर्कश के विषय में उन्हें बताते हैं………और खुशी की बात यह है कि शर्कश में दो जोकोरों की आवश्यकता है ,किसनलाल गुरुदास और अनंतराम को अपने शरकश में जोकर का काम दिलाते हैं…..

विडम्बना बस इतनी हैकि छत्रपति शिवाजी बनने के सपने देखने वाला गुरुदास एवं प्रधानमंत्री की लालसा रखने वाला अनंतराम आज मुंबई के शरकश के जोकर बन जाते हैं…….
किन्तु दोनों के चेहरे में संतुष्टि है….क्यूंकि उनके शरकश में न तो डिग्रियों की आवश्यकता है…और न गलत काम करने की….!
अपने जीवन के अँधेरे में उन्हें उजाले का अहसास होता है…….

अपने पहले ही शो में गुरुदास दर्शकों को अपने अजीब अजीब हरकतों से बहुत हँसाता है…….वहीँ अनंतराम जानवरों को काबू करने का करतब दिखाता है….कभी बन्दर कभी शेर तो कभी हाथी….अनंतराम के इशारों पर दर्शकों का मनोरंजन करते हैं…..
समय बीतता जाता है…….अनंतराम और गुरुदास लाला काका से मार्शल आर्ट की शिक्षा लेते हैं……..काका अमरनाथ निशानेबाजी में उन्हें निपुण बनाने का प्रयास करते हैं………चाचा किसनलाल दोनों को bike stunts ,जिम्नास्टिक और अन्य शारीरिक कलाओं से परिचित करवाते हैं………….
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देखते ही देखते किशनलाल के दोनों हीरे अपनी अद्भुत प्रतिभा और तमन्ना कि दृढ इच्छा शक्ति से शरकश के सभी पार्ट्स में श्रेष्ठता प्राप्त कर लेते हैं………

मुंबई में जुपिटर शरकश बहुत से शो आयोजित करता हैं……..और उनमे गुरुदास और अनंतराम के मनभावन और आश्चर्य जनक कारनामे दर्शकों को जुपिटर शरकश की और खिंच लाते हैं ……….जुपिटर शरकश पुरे मुंबई में लोकप्रिय हो जाता है…….हर एक शो हाउसफुल….
टीवी channels में अत्यधिक चर्चा होती है……..गुरुदास और अनंतराम को दुनियां जानने लगती है……….

समाचार पत्रों में गुरुदास और अनंतराम की मुशकुराती तस्वीरें छपती है………गुरुदास का सिसकता ह्रदय अब स्वतंत्र होकर धड़कने लगता है……वहीँ अनंतराम का आत्मविश्वास सातवें आसमान को छुं लेता हैं…………

जोकर बनना और सबको हँसाना अद्भुत कला है……किन्तु अब तक हमारा सभ्य समाज उनको उनके कार्यक्षेत्र से वंचित रखता है केवल इसलिए कि वो डिग्रियां पा कर मशीन बन सके…….ऐसी जॉब कर सकें जिसका उद्देश्य केवल विलासिता हो अपने जिस व्यक्तित्व के कारण बचपन से अपने विद्यालय एवं शिक्षित समाज में उन्हें हमेशा तिरस्कार मिला था….. आज उनके लिए वही वरदान सिद्ध हुआ…..गुरुदास और अनंतराम का मुश्कुरता व्यक्तित्व एवं अजीब से ख्याल आज उनके आय का स्त्रोत बन गयी……
एक महीने तक काम करने के बाद गुरुदास और अनंतराम को 5000 रूपये की सेलरी मिलती है……दोनों अपने घर अपना आधा पैसा भेज देते हैं…………शरकश से अपने सपनों को पूरा करते हुए वे संसार की वास्तविकता में गतिमान रहते हैं……….

शरकश से गुरुदास और अनंतराम को एक सप्ताह कि छुट्टी मिलती है……..गुरुदास और अनंतराम गर्व से अपने गांव पहुंचते हैं….! गांव में उनका नया सम्बन्धी उनकी प्रतीक्षा में है……………………………

क्या होता है जब अपनी सफलता लिए गुरुदास और अनंतराम अपने गांव पहुँचते हैं……? क्या दोनों अपने गांव की विकट परिस्थितयों को दूर करने में समर्थ हो पाते है……..?
जानने के लिए पढें अगला अंक………जल्द ही प्रकाशित करूँगा…….ऐसी ये कैसी तमन्ना है……..4

लाइफ में कितनी ही मुश्किलें क्यूँ न हो…… अवसर भी उतने ही होते हैं…..यदि हम मुश्किलों से डरकर अपनी आंखें बंद कर लें तो हम सदैव अपने अवसरों से वंचित रहते हैं आवश्यकता इतनी है कि हम मुश्किलों का साहसपूर्वक सामना करें……..अपने सपनों को पूरा करने के अवसर हमें मिलते जायेंगे……………निर्णय हमें लेना है…..?
मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं, स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं
हिम्मत मत हार गिर कर ओ मुशाफिर,ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं….!

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak bisht के द्वारा
July 27, 2012

प्रितिश जी, आप बहुत ही उम्दा रचनाकार बनने की राह पर हैं । यूं ही बढ़ते रहें। शुभकामनायें!

ambric04 के द्वारा
July 21, 2012

मान गये प्रीतीश भाई .कहानी में बांधे रखने की कला तो कोई आपसे सीखे अगले अंक का इंतज़ार रहेगा

seemakanwal के द्वारा
July 16, 2012

प्रीतिश जी बधाई .गिरतें हैं शहसवार ही मैदाने जंग में .

jalaluddinkhan के द्वारा
July 12, 2012

अच्छा प्रयास है.जिसकी सराहना किये बिना कोई नहीं रहेगा.कलम की रवानी यह संकेत देती है कि समाज को एक अच्छा लेखक मिल गया है.खुद को लेखन और वरिष्ट साहित्यकारों को पढने में निरंतर लगाये रहिये.वह दिन दूर नहीं जब आपकी गिनती सफल साहित्यकारों में होगी.

    jalaluddinkhan के द्वारा
    July 12, 2012

    मेरा कमेन्ट योगी सारस्वत के ब्लॉग पर देखिये.शायद मुझे कुछ सीख मिले.

nishamittal के द्वारा
July 10, 2012

रोचक,मनोरंजक शिक्षाप्रद प्रस्तुति प्रीतिश जी.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 29, 2012

प्रीतीश जी, सस्नेह !………लगता है , यह आप की धारावाहिकी हिट होकर रहेगी | आप में संभावनाएं उच्छाल भर रहीं हैं ! शेष शुभ !!

    pritish1 के द्वारा
    June 29, 2012

    आचार्य जी धारावाहिक हित हो या न हो मुझे लिखने मैं बड़ा मज़ा आ रहा है……..नया हूँ ना…….लेकिन अपनी परीक्षाओं के कारन समय नहीं दे पा रहा हूँ……आप मेरे अगले आलेख मैं सप्रेम आमंत्रित हैं…… धन्यवाद….!

Punita Jain के द्वारा
June 29, 2012

प्रीतीश जी, आपकी लिखी हुई यह कहानी बहुत अच्छी ,रुचिकर ,मनोरंजक और शिक्षाप्रद लगी |–शुभकामनायें |

    pritish1 के द्वारा
    June 29, 2012

    धन्यवाद पुनीत जी……….अगले आलेख मैं आप सप्रेम आमंत्रित हैं……. धन्यवाद….!

sadhna srivastava के द्वारा
June 28, 2012

वाह….. मजेदार …… बहुत बढ़िया लिखा है…. प्रीतीश जी….. :) मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं, स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं हिम्मत मत हार गिर कर ओ मुशाफिर,ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं….!! बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं…… :)

    pritish1 के द्वारा
    June 29, 2012

    साधना जी आप यहाँ आये……..अच्छा लगा……..

    ajaykr के द्वारा
    July 13, 2012

    कवि रामधारी सिंह दिनकर की बहुत ही उम्दा पंक्तियाँ हैं ……….

    pritish1 के द्वारा
    July 16, 2012

    रामधारी सिंह दिनकर मेरे प्रिय कवी हैं………….वे देश के लिए लिखते थे……..हमारे लिए लिखते थे……………

yogi sarswat के द्वारा
June 28, 2012

मज़ा आ गया , प्रीतिश जी ! सही लिखा आपने की गुरदास और अनंतराम ने अपने म्हणत और काबिलियत के दम पर अपनी पहिचान बनाई ! शुरुआत बड़ी मस्त लगी जब आपका नायक सपना देख रहा होता है ! बिलकुल वेड प्रकाश जी के उपन्यास की तरह इंतज़ार करा रहे हो भाई , जल्दी से अगली कड़ी लेकर आओ !

    pritish1 के द्वारा
    June 28, 2012

    आपके आगमन का आभारी हूँ……..अगला अंक जल्द प्रकशित करूँगा………अभी से आपको अगले अंक के लिए निमंत्रण आपका अपना प्रीतीश

dineshaastik के द्वारा
June 28, 2012

प्रीतेश जी कहानी के तीसरे अंक  की प्रस्तुति के लिये बधाई,  अगली कहानी के इंतजार में…..

    pritish1 के द्वारा
    June 28, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी………आपकी प्रतिक्रिया का आभारी हूँ…….

prashantam के द्वारा
June 27, 2012

कहानी के अगले भाग के प्रतीक्षा में,वो नया सम्बन्धी कौन है……..

    pritish1 के द्वारा
    June 29, 2012

    धन्यवाद……..! मित्रवर……..

rick के द्वारा
June 27, 2012

कहानी की गतिशीलता से प्रेरित हूँ………दो विद्यार्थियों की सच्ची कहानी प्रतीत होती है…..

    pritish1 के द्वारा
    June 29, 2012

    सप्रेम…….बंधुवर थैंक्स

allrounder के द्वारा
June 27, 2012

नमस्कार भाई प्रीतेश जी, एक अच्छे आलेख पर बधाई आपको !

    pritish1 के द्वारा
    June 28, 2012

    धन्यवाद……….!

jlsingh के द्वारा
June 27, 2012

दुनिया एक सर्कश है, और सर्कश में बड़ों को भी छोटों को भी छोटे को भी मोटे को भी आना जाना पड़ता है… मेरा नाम जोकर का गाना गाना पड़ता है . कहानी में प्रवाह अच्छी है आगे बढ़ते रहें ….

    pritish1 के द्वारा
    June 28, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी……………उत्साह वर्धन के लिए स्नेह्साहित……..प्रीतीश


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